गांधी जी को महात्मा की उपाधि किसने दी?
Gandhi ji ko mahatma ki upadhi kisne di: क्या आपने कभी सोचा है कि एक साधारण वकील कैसे दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों से अहिंसा के बल पर टकराया और इतिहास बदल दिया? मोहनदास करमचंद गांधी, जिन्हें हम महात्मा गांधी के नाम से जानते हैं, की कहानी ऐसी ही प्रेरणादायक है। लेकिन सवाल उठता है – गांधी जी को यह ‘महात्मा’ की उपाधि किसने दी? यह उपाधि, जो ‘महान आत्मा’ का अर्थ रखती है, उनकी जीवन यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस लेख में हम इस रहस्य को खोलेंगे, ऐतिहासिक तथ्यों पर गौर करेंगे और देखेंगे कि कैसे रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान व्यक्तित्व ने इसमें भूमिका निभाई। यदि आप Who gave Mahatma title to Gandhi के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है।
महात्मा गांधी का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनके पिता करमचंद गांधी एक दीवान थे, जबकि मां पुतलीबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। बचपन से ही गांधी जी पर जैन धर्म और हिंदू परंपराओं का गहरा प्रभाव पड़ा, जो बाद में उनकी अहिंसा की नींव बने।
स्कूल के दिनों में गांधी जी औसत छात्र थे, लेकिन ईमानदारी और नैतिकता उनके जीवन का हिस्सा थी। 13 साल की उम्र में उनका विवाह कस्तूरबा से हुआ, जो उनके जीवन की साथी बनीं। 1888 में वे बैरिस्टर बनने लंदन गए। वहां उन्होंने पश्चिमी संस्कृति को अपनाया, लेकिन भारतीय मूल्यों को नहीं छोड़ा। लंदन में वे शाकाहारी सोसाइटी से जुड़े और भगवद्गीता का गहन अध्ययन किया।
यह दौर गांधी जी के व्यक्तित्व निर्माण का था। वे वापस भारत लौटे और वकालत शुरू की, लेकिन असली परिवर्तन दक्षिण अफ्रीका में हुआ।
दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी का संघर्ष और सत्याग्रह की शुरुआत
1893 में गांधी जी एक मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए। वहां रंगभेद की घटनाओं ने उन्हें झकझोर दिया। एक बार ट्रेन में प्रथम श्रेणी के टिकट होने के बावजूद उन्हें बाहर फेंक दिया गया, क्योंकि वे ‘रंगीन’ थे। यह घटना उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी।
गांधी जी ने भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया। उन्होंने नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की और सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया। सत्याग्रह, यानी सत्य की खोज में अहिंसक प्रतिरोध। 1906 में एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट के खिलाफ उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया। हजारों भारतीयों ने गिरफ्तारियां दीं।
दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी ने टॉलस्टॉय फार्म स्थापित किया, जहां सामुदायिक जीवन सिखाया जाता था। यहां से उनकी छवि एक नेता के रूप में उभरी। कुछ स्रोतों के अनुसार, 1914 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन टाउन हॉल में उन्हें पहली बार ‘महात्मा’ कहा गया। लेकिन यह दावा विवादास्पद है। इस संघर्ष ने उन्हें भारत की आजादी की लड़ाई के लिए तैयार किया।
भारत वापसी और स्वतंत्रता संग्राम में गांधी जी की भूमिका
1915 में गांधी जी भारत लौटे। गोपाल कृष्ण गोखले के सुझाव पर उन्होंने देश भर का दौरा किया। चंपारण में किसानों की दुर्दशा देखी और 1917 में पहला सत्याग्रह किया। यहां से उनकी लोकप्रियता बढ़ी।
रौलट एक्ट के खिलाफ 1919 में सत्याग्रह शुरू हुआ, लेकिन जलियांवाला बाग हत्याकांड ने सब बदल दिया। गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाया, जिसमें स्वदेशी और स्वराज पर जोर दिया। 1922 में चौरी-चौरा घटना के बाद आंदोलन रोका, जो उनकी अहिंसा की प्रतिबद्धता दिखाता है।
1930 का नमक सत्याग्रह विश्व प्रसिद्ध हुआ। दांडी मार्च में उन्होंने ब्रिटिश नमक कानून तोड़ा। लाखों लोग जुड़े। पूना पैक्ट, क्विट इंडिया मूवमेंट – गांधी जी की रणनीतियां अनोखी थीं। लेकिन इन सबके बीच ‘महात्मा’ उपाधि का सवाल महत्वपूर्ण है।
महात्मा उपाधि की उत्पत्ति: विभिन्न ऐतिहासिक दावे
‘महात्मा’ शब्द संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ ‘महान आत्मा’ है। गांधी जी को यह उपाधि कब और किसने दी? यह एक बहस का विषय है।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार, सबसे पुराना लिखित प्रमाण 1909 का है, जब उनके मित्र प्रांजिवन मेहता ने गोपाल कृष्ण गोखले को पत्र में गांधी जी को ‘महात्मा’ कहा। यह दक्षिण अफ्रीका के समय का है।
फिर 21 जनवरी 1915 को गुजरात के जेतपुर में नौतमलाल भगवानजी मेहता ने एक सम्मान पत्र में उन्हें ‘महात्मा’ कहा। यह दस्तावेज नेशनल गांधी म्यूजियम में सुरक्षित है।
अप्रैल 1915 में गुरुकुल कांगड़ी के निवासियों ने उन्हें ‘महात्मा’ कहा, और गांधी जी ने संस्थापक मुंशीराम को महात्मा कहा (जो बाद में स्वामी श्रद्धानंद बने)।
कुछ स्रोत दक्षिण अफ्रीका के 1914 को इंगित करते हैं। लेकिन सबसे लोकप्रिय दावा रवींद्रनाथ टैगोर का है।
रवींद्रनाथ टैगोर की भूमिका और महात्मा उपाधि
रवींद्रनाथ टैगोर, नोबेल पुरस्कार विजेता कवि, ने 6 मार्च 1915 को गांधी जी को ‘महात्मा’ कहा। यह शांतिनिकेतन में उनकी पहली मुलाकात के दौरान हुआ। टैगोर ने गांधी जी को ‘गुरुदेव’ कहकर संबोधित किया, तो गांधी जी ने उन्हें ‘महात्मा’ कहा। नहीं, उल्टा – टैगोर ने गांधी को महात्मा कहा, और गांधी ने टैगोर को गुरुदेव।
टैगोर ने गांधी जी के अहिंसक संघर्ष से प्रभावित होकर यह उपाधि दी। हालांकि कुछ विद्वान जैसे शंख घोष कहते हैं कि टैगोर पहले नहीं थे, लेकिन उन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया। गुजरात हाई कोर्ट ने भी स्कूल किताबों में टैगोर को श्रेय दिया है।
टैगोर की वजह से यह उपाधि दुनिया भर में फैली। गांधी जी खुद को महात्मा कहलाना पसंद नहीं करते थे, लेकिन जनता ने अपनाया।
गांधी और टैगोर का संबंध: मित्रता और मतभेद
गांधी और टैगोर की मित्रता गहरी थी। 1915 की पहली मुलाकात से लेकर टैगोर की मृत्यु 1941 तक वे पत्र लिखते रहे। टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा, गांधी ने टैगोर को ‘गुरुदेव’।
वे एक-दूसरे का सम्मान करते थे, लेकिन मतभेद भी थे। टैगोर असहयोग आंदोलन के खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह असहिष्णुता पैदा कर सकता है। गांधी ने टैगोर की राष्ट्रीयता की आलोचना की। फिर भी, उनकी बहस सभ्य थी।
एक बार टैगोर ने लिखा, “गांधी जी के आह्वान पर भारत नई ऊंचाइयों पर पहुंचा।” यह संबंध भारतीय इतिहास का अनमोल हिस्सा है।
महात्मा उपाधि का महत्व और गांधी जी की दर्शनशास्त्र
‘महात्मा’ उपाधि गांधी जी की नैतिक ऊंचाई को दर्शाती है। यह उनके सत्य, अहिंसा और सरल जीवन का प्रतीक है।
अहिंसा का सिद्धांत
गांधी जी मानते थे कि हिंसा से हिंसा जन्मती है। दक्षिण अफ्रीका से भारत तक, उन्होंने अहिंसा को हथियार बनाया। उदाहरण: दांडी मार्च में कोई हिंसा नहीं, फिर भी ब्रिटिश साम्राज्य हिला।
सत्याग्रह की शक्ति
सत्याग्रह सत्य की रक्षा है। चंपारण में नीली खेती के खिलाफ यह सफल रहा। गांधी जी कहते थे, “सत्य ही ईश्वर है।”
स्वराज और स्वदेशी
गांधी जी का स्वराज आत्म-शासन था। चरखा चलाना आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक था।
ये सिद्धांत उन्हें महात्मा बनाते हैं।
गांधी जी की विरासत और महात्मा उपाधि का प्रभाव
गांधी जी की मृत्यु 30 जनवरी 1948 को हुई, लेकिन उनकी शिक्षाएं जीवित हैं। मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला ने उनसे प्रेरणा ली। ‘महात्मा’ उपाधि आज भी उनकी महानता की याद दिलाती है।
भारत में गांधी जयंती राष्ट्रीय पर्व है। उनकी किताबें जैसे ‘हिंद स्वराज’ प्रेरणा स्रोत हैं।
निष्कर्ष: मुख्य takeaways और आगे की राह
गांधी जी को महात्मा की उपाधि मुख्य रूप से रवींद्रनाथ टैगोर ने दी, हालांकि अन्य दावे भी हैं। यह उपाधि उनकी नैतिक शक्ति का प्रमाण है। आज की दुनिया में अहिंसा की जरूरत है। यदि आप Gandhi Ji Mahatma title origin के बारे में और जानना चाहें, तो ऐतिहासिक किताबें पढ़ें। क्या आप गांधी जी के सिद्धांत अपनाएंगे? विचार करें और साझा करें।
मुख्य takeaways:
- महात्मा उपाधि की शुरुआत 1909 से, लेकिन टैगोर ने लोकप्रिय की।
- गांधी-टैगोर संबंध मित्रता और बहस का मिश्रण।
- अहिंसा और सत्याग्रह永恒 हैं।
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FAQs
गांधी जी को महात्मा की उपाधि किसने दी?
रवींद्रनाथ टैगोर ने 1915 में दी, हालांकि पहले भी प्रयोग हुए।
महात्मा शब्द का अर्थ क्या है?
संस्कृत में ‘महान आत्मा’। गांधी जी की नैतिक ऊंचाई को दर्शाता है।
गांधी और टैगोर की पहली मुलाकात कब हुई?
6 मार्च 1915 को शांतिनिकेतन में।
क्या गांधी जी को महात्मा कहलाना पसंद था?
नहीं, वे खुद को साधारण मानते थे।
महात्मा उपाधि के अन्य दावे क्या हैं?
प्रांजिवन मेहता (1909), नौतमलाल मेहता (1915), दक्षिण अफ्रीका (1914)।
गांधी जी ने टैगोर को क्या कहा?
गुरुदेव।
महात्मा गांधी की प्रमुख किताबें कौन सी हैं?
हिंद स्वराज, माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ।
गांधी जी का जन्म कब हुआ?
2 अक्टूबर 1869।
क्या ब्रिटिश ने गांधी जी को महात्मा कहा?
नहीं, यह भारतीय मूल का है।
गांधी जी की विरासत क्या है?
अहिंसा, सत्य, स्वराज – विश्व को प्रभावित।
